मज़ा जीने में

Posted सितम्बर 21, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized

मंजिलों पे तो सिर्फ तन्हाई है
रास्तों पे गुजरने का मज़ा हैं
फूल बनके खिलने से ज्यादा
खुशबु बनके बिखरने का मजा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है

कश्तियाँ साहिल पे नहीं इतराती
वो लहरों की छाती चीरने के सपने देखे
उजाले को कब मिली राहत उजाले में
वो अँधेरे से लड़के मरने के सपने देखे
ना बांधो ख्वाबों को यथार्थ की डोर से
सोच की क्षितिज को धकेलने में मजा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है

सांझ ने हर रोज़ आके गुजर जाना हैं
सहर के इंतज़ार में मज़ा हैं
कब्र तो तैयार है हर एक की
मौत से प्यार करने में मजा हैं
बेमायने तो हर रोज़ मरती हैं ज़िन्दगी
मकसद हो तो एक बार मरने में मज़ा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है

तुझ में कुछ बात तो होगी

Posted जुलाई 21, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हर रोज़ तेरे दर पे शमा जलती हैं
तुझ में कुछ बात तो होगी
तेरे ख्याल से गम की शाम ढलती हैं
तुझ में कुछ बात तो होगी

क्यों झुकता है सर बरबस तेरे आगे
क्यों हर बार मैं बेनकाब होता हूँ
तेरा एहसास जगाये जीने का जूनून
तुझ में कुछ बात तो होगी
तेरे ज़िक्र में रूह पाती है सुकून
तुझ में कुछ बात तो होगी

गुल खुशबु तू, गुलशन भी तू
पतझड़ भी तू, सावन भी तू
मौत की काली चादर अगर
किल्कारिओं भरा जीवन भी तू
माँ तेरा नाम ले पीठ थपथपाए
तुझ में कुछ बात तो होगी
तू छुए तो गुड प्रसाद बन जाये
तुझ में कुछ बात तो होगी

तेरे माटी के टुकड़े देख
यहाँ दिन रात रोते हैं
दौड़ते बटोरने खुशियाँ
रूह का चैन खोते हैं
फिर हो बेउम्मीद, आते तेरी चौघट
तुझ में कुछ बात तो होगी
हर बिगड़ी तेरे दर पे जाती है पलट
तुझ में कुछ बात तो होगी

माँ

Posted मई 22, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

मेरे घर लौटने पे चिड़ियों सी चेह्कती है माँ
मेरे हर आंसू पे आज भी दहकती है माँ
मेरा बचपन संजोये आँखों में
मेरी साँसों में मेरी बातों में महकती है माँ

लाख बुरा बनाये मुझे ये दुनिया
गंगा सा पावन मुझे करती है माँ
जो मिले मुझे सुकून की ज़िन्दगी
लाख काँटों से रोज़ गुजरती हैं माँ

सुला के आज भी अपनी गोद में
मुझे प्यार से देखा करती है माँ
रब की मेहर तो होती कभी कभी
शामोसेहेर मेहर करती है माँ

बांधे टूटे हौंसले, उम्मीदों की डोर से
मेरे मकान को घर बनाती है माँ
फ़िक्र नहीं मुझे गगन तेरी छाँव की
जब तलक आँचल तले सुलाती हैं माँ

माँ के सिवा क्या नाम दूं ऐ खुदा तुझे
कभी नींद से जगाती है
कभी लगा छाती से सुलाती है माँ

सुबह की बात

Posted फ़रवरी 25, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

चाँद छुपा के झोली में, सूरज से पर्दा हटाया
आँखों आधी खुली है आधी बंद
किसी हवा के झोंके ने, बालों को सहलाया

कुछ सपने जो कल टूटे थे, लो आज फिर बन गए
किसने जोड़ के टुकड़े हर ख्वाब फिर सजाया
कल जो गुस्सा था आज कम है
रात की मलहम ने हर घाव को सहलाया

कन्धों पे लिए बसते निकले गली के बच्चे
बचपन पे लगी धुल को पल भर के लिए हटाया
आज रंग अलग है फिजा अलग है
गुलों की वादियों को नए फूलों ने महकाया

परिंदों को जाते देखा तो हमें भी एहसास हुआ
बिस्तर छोड़ने का अपना भी वक़्त आया
आज चलो कुछ नयी कहानी लिखेंगे
शायद आज ज़िन्दगी बेहतर होगी
ये ख्वाब दिखा फिर सुबह ने दिन भर दौड़ाया

काम धंधा छोड़ के हम करने लगे पढाई

Posted जनवरी 28, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

बड़े सालों बाद रातों में जगे हैं
बड़े सालों बाद किताबों तले दबे हैं
बड़े सालों बाद पढ़ते पढ़ते नींद आई
काम धंधा छोड़ के हम करने लगे पढाई

टीचर से डांट खाना, बाहर आके ठहाके लगाना
आँखें खोल के सोना, पैसे के लिए रोज़ रोना
टीपा टापी करने में बच्चों सी ख़ुशी पाई
काम धंधा छोड़ के हम करने लगे पढाई

नौकरी क्या है, दूर पानी की चमक जैसे
कल छोड़ी फिर मिलेगी बेवफा सनम जैसे
कैसे भूलें जो मौजें इस चारदीवारी बीच उड़ाई
काम धंधा छोड़ के हम करने लगे पढाई

पन्नो में घुल गयी, यूँ सारी ज़िन्दगी

Posted नवम्बर 28, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: General


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

वो लब्जों से आशिकी, वो कलमो से दोस्ती
पन्नो में घुल गयी, यूँ सारी ज़िन्दगी

गम था वो कोई, या ख़ुशी का झोंका
अरमानो की लहर को, पन्नो पे लाके रोका
वो खुदाई थी तेरी, या मेरी बंदगी
पन्नो में घुल गयी, यूँ सारी ज़िन्दगी

वो हंस के मेरा कहना, ख़ामोशी से तेरा सुनना
लब्जों की करवटों पे, सपनो के महल बुनना
वो प्यार ही थे मेरा, ना कहना दिल्लगी
पन्नो में घुल गयी, यूँ सारी ज़िन्दगी

अच्छा है कुछ रास्ते मंजिलों तक नहीं जाते

Posted नवम्बर 21, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized

अच्छा है कुछ रास्ते मंजिलों तक नहीं जाते
साँसे आती रहती है, ज़िन्दगी चलती रहती हैं
सुना है कब्रों की गर्मी में, जिस्म फ़ना हो जाते है
इरादों की शमा लेकिन, बेखबर जलती रहती है

देश ये गजब हैं

Posted अगस्त 9, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: Uncategorized


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

देश तेरा देश मेरा
देश ये अजब हैं
कांटे झेल हंस रहा
देश ये गजब हैं

खेलों के बहाने यहाँ
लूट चारों ओर हैं
भूख की आवाज़ नहीं
नेताओं का शोर हैं

सीना ताने कोई वहां
मौत आगे खड़ा देखो
ज़मीर बेच कोई यहाँ
दौलत पीछे पड़ा देखो

फूल सब्जियों में रोज़
मिलावट की धूम है
ज़हर बेचकर भी देखो
ये बनता मासूम हैं

टीवी आगे खेल रहे
नन्हे खिलाडी देखो
माटी देख डर रहे
माटी के अनाडी देखो

गद्दी की होड़ में
सबसे आगे चोर हैं
पढ़े लिखे पिस रहे
डंडों का जोर है

लड़ने में व्यस्त यहाँ
सारे मजहब देखो
दुःख देके दुनिया को
ढूंढे यहाँ रब देखो

मिला पाके खुश नहीं
बस पाने की तलब हैं
कांटे झेल हंस रहा
देश ये गजब हैं

वो प्यार सच्चा था

Posted अगस्त 9, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: General


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

न आँखें नाम कभी करना, तुम्हारा प्यार सच्चा था
मेरे दिल में तुम ही तुम हो, मेरा इकरार सच्चा था

जो लब पे आ नहीं पाया, वो इज़हार सच्चा था
तेरी बेखुदी भी सच्ची थी, मेरा खुमार सच्चा था

न जाने कौन सी बातें, ये करते है खुदा वाले
खुदा से पूछ ले जाके, ज़मीरे यार सच्चा था

वो सुबह क्यों नहीं आती, शाम ढलती नहीं वैसे
ज़ख्म ज़ाहिर नहीं तो क्या, वक़्त का वार सच्चा था

किसी की उठती डोली क्यों, लगे अरमानो की अर्थी सी
वो क्या एहसान मानेगे, तेरा उपकार सच्चा था

साँसे अब भी आती हैं, शायद हम भी जिंदा है
तुझे भूलें भी तो कैसे, हमारा प्यार सच्चा था

बात नज़रिए की

Posted जुलाई 14, 2007 by vikasvardhan
श्रेणी: choti si baat


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जिसने पैदा किया, उस माँ का बेटा
जिस कमरे में गुजरा बचपन, उस कमरे वाला हो गया
घर की चौघट पे, उस घर का
मोहल्ले से निकला तो, उस मोहल्लेवाला हो गया
ज्यों लांघा अपना गाँव, हो गया उस गाँव का
देश के बाहर लो, उस देश वाला हो गया
चलते चलते सब कुछ तो मिलता चला गया
खाली झोली देख के न सोचो मेरा दिवाला हो गया

जो तन मेरा छूट गया, ऐ धरा तेरे आँगन में
खुले गगन में उड़ता मैं, आज लो धरती वाला हो गया
सब बात है नज़रिए की मेरे दोस्त
अब कश्मीर और लाहौर दोनों है मेरे
सरहदों के जंग का यों पल भर में निवाला हो गया
चलते चलते सब कुछ तो मिलता चला गया
खाली झोली देख के न सोचो मेरा दिवाला हो गया


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