सूरज तुम क्यों छुप जाते हो


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पूर्व से पश्चिम तुम घूमो, एक पल न क्यों रुक पाते हो
कहीं देखे तेरी राह कोई, तुम रात कहाँ पे बिताते हो
मेरे संग कैसा खेल है ये, हर रोज़ कहाँ गुम जाते हो
कुछ तारे भरके झोली में, सूरज तुम क्यों छुप जाते हो

सब तारे लगते सूरज जैसे, पर मुझे न कोई भाता है
एक सूरज करता जग रोशन, तारों से कहाँ हो पाता है
तेरे संग चलता है जीवन, थम जाए जो तुम थम जाते हो
फिर किसके भरोसे छोड़ हमें, सूरज तुम क्यों छुप जाते हो

बच्चों के जैसे कोमल से, तुम सुबह संवर के आते हो
शबनम से नहाये फूलों को, बड़े प्यार से तुम सहलाते हो
फिर हर जीवन में रंग भरने, दिन भर ख़ुद को तपाते हो
गुस्सा होके किस बात पे फिर, शाम में क्यों छुप जाते हो

हर सुबह शायद मेरी याद, नींद से तुम्हे जगाती है
अम्बर पे छलकी लालिमा, तेरे आने का यकीन बन जाती हैं
जीवन की प्यारी तस्वीर कोई, तुम रोज़ गगन पे बनाते हो
समझाने हमें एक अमिट सत्य,  सूरज तुम शायद छुप जाते हो

Published in: on June 29, 2007 at 11:48 p Comments (0)

ये आदत कुछ ठीक नहीं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

प्यास लगे महखाने जाना, ये आदत कुछ ठीक नहीं
सबको दिल का हाल बताना, ये आदत कुछ ठीक नहीं

कुछ लोग दीवाने ऐसे है, घर बार लुटा के बैठे हैं
हर चीज़ लुटा दी है तुमपे, संसार लुटा के बैठे हैं
हँसी भी इन होटों की चुराना, ये आदत कुछ ठीक नहीं

कभी चलते चलते यूँ भी तो हो, कोई बीता पल टकरा जाए
मन बनके पतंग बिन डोर कहीं, फिर उसके संग उडा जाए
तन्हाई की महफिल में कभी, दिल को सुकून जब आने लगे
दुनिया की तब बातें करना, ये आदत कुछ ठीक नहीं

होश वहाँ होता है गुम, जहाँ सच्ची चाहत रहती है
जुबान तो चुप हो जाती है, आँखें सब बातें कहती है
दिल मस्त समंदर सा डोले, प्यार की बारिश होने लगे
आँखें बंद तब कर लेना, ये आदत कुछ ठीक नहीं

कहीं कोई ऐसा बाग़ नहीं, जहाँ केवल कलियाँ खिलती हो
नहीं कोई ऐसी डगर कहीं, जिस पे बस खुशियाँ मिलती हो
जो मिला तुझे वो है काफ़ी, जीवन भर मुस्काने के लिए
जो मिला नहीं उस पर रोना, ये आदत कुछ ठीक नहीं

Published in: on at 11:48 p Comments (0)

ये बारिश की है बूंदे या, किसी की आँख का पानी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ये बारिश की है बूंदे, या किसी की आँख का पानी
ये खुशी का है मौका, या कोई दर्दों की कहानी
किस से माँगू मैं हिसाब, इन बिगड़े हालत का
कैसे मनाऊँ जशन मैं, इस बेमौसम बरसात का

चंद कोने करने रोशन, सारा आलम जला डाला
चांदनी पाने के खातिर, चाँद को ही मिटा डाला
उम्र अँधेरी कर गया, मेरा शौक एक रात का
कैसे मनाऊँ जशन मैं, इस बेमौसम बरसात का

इरादों की दो धारी तलवार से, सारे परदे हट गए
खुला गगन उड़ने को था, क्यों पंख मेरे कट गए
ढूंढने पर भी न मिला, खोया जो आंसू आँख का
कैसे मनाऊँ जशन मैं, इस बेमौसम बरसात का

ये चंद माटी के टुकड़े, माटी से बड़े जब हो गए
गिरे है तब माटी मे ये, और माटी में ही खो गए
ये रंगती सबको एक रंग, भेद न कोई जात का
यहीं पे अंत होता है इस बेमौसम बरसात का

Published in: on May 22, 2007 at 11:48 p Comments (0)