सूरज तुम क्यों छुप जाते हो
पूर्व से पश्चिम तुम घूमो, एक पल न क्यों रुक पाते हो
कहीं देखे तेरी राह कोई, तुम रात कहाँ पे बिताते हो
मेरे संग कैसा खेल है ये, हर रोज़ कहाँ गुम जाते हो
कुछ तारे भरके झोली में, सूरज तुम क्यों छुप जाते हो
सब तारे लगते सूरज जैसे, पर मुझे न कोई भाता है
एक सूरज करता जग रोशन, तारों से कहाँ हो पाता है
तेरे संग चलता है जीवन, थम जाए जो तुम थम जाते हो
फिर किसके भरोसे छोड़ हमें, सूरज तुम क्यों छुप जाते हो
बच्चों के जैसे कोमल से, तुम सुबह संवर के आते हो
शबनम से नहाये फूलों को, बड़े प्यार से तुम सहलाते हो
फिर हर जीवन में रंग भरने, दिन भर ख़ुद को तपाते हो
गुस्सा होके किस बात पे फिर, शाम में क्यों छुप जाते हो
हर सुबह शायद मेरी याद, नींद से तुम्हे जगाती है
अम्बर पे छलकी लालिमा, तेरे आने का यकीन बन जाती हैं
जीवन की प्यारी तस्वीर कोई, तुम रोज़ गगन पे बनाते हो
समझाने हमें एक अमिट सत्य, सूरज तुम शायद छुप जाते हो
