कुल का अंत तमाम हुआ

Posted November 3, 2007 by vikasvardhan
Categories: choti si baat

भरी सभा के बीच खड़ी
वो चन्द्रवंश की शोभा थी
ललकार लहू को मार रही
वो अग्नि सम आभा थी
लज्जा की मूरत का देखो
भरी सभा अपमान हुआ
नारी का आदर भूले कौरव
तो कुल का अंत तमाम हुआ

ममता की मूरत सीता को
जब रावण बरबस हर लाया
अभिमान में न जान सका
काल वो अपने घर लाया
लंका सारी ही जला डाली
आंसू न कोई नाकाम हुआ
नारी का आदर भुला रावण
तो कुल का अंत तमाम हुआ

मैं गुल हूँ तेरे लिए मुस्काऊंगा

Posted July 23, 2007 by vikasvardhan
Categories: Uncategorized

कुचल दो चाहे पैरों में
चाहे गले का हार करो
सजाओ मुझसे घर आँगन
चाहे गुलशन को राख करो
मैं लबों से न कुछ दोहराऊँगा
मैं गुल हूँ तेरे लिए मुस्काऊंगा

सूरज को न जलना सिखाओ
पानी को न राह दिखाओ
जो तपके कुंदन हो निकला
उसे न अब तुम आग लगाओ
नफरत पाके भी मैं जग महकाऊँगा
मैं गुल हूँ तेरे लिए मुस्काऊंगा

वक़्त के सारे ज़ख्मों को
मैंने छाती से लगाया हैं
अपनों संग गैरों के भी
हर घाव को मैंने सहलाया हैं
शबनम तेरे नज़र करने
मैं रात में आंसू बहाऊंगा
मैं गुल हूँ तेरे लिए मुस्काऊंगा

छोटी कहानी

Posted May 29, 2007 by vikasvardhan
Categories: Uncategorized

राम, रहीम, यशु, गुरु नानक
आपस में कर रहें थे बात
कोशिश में वो लगे थे की
जाने कुछ भारत के हालात्

दिखा उन्हें कुछ साफ़ नहीं
क्या अजब सा खेला था
मुरझाये चेहरों में लगा
आज ख़ुशी का मेला था

नाम की जय सब करते
मर्म नाम का जाने ना
सोने में समेटे इश्वर को
खुद में छुपा ये माने ना

एक बन्दा आ पहुंचा वहां
और आके ये गुहार लगाई
हर लो दुःख मेरे प्रभु जी
जीवन मेरा भया दुखदायी

राम देखे रहीम की ओर
नानक के समझ न आया
यशु भी थे असमंजस में
मेरे प्रभु कहके किसे बुलाया

एक ही खुशबु एक ही रंगत
एक फूल को हम पंखुडियां
आपस में न फर्क दिखे
इसने कैसे भेद जताया

नानक के चरणों में गिरा
मुख से जय राम उचारा
नानक बोले में नानक हूँ
क्या तुमने था मुझे पुकारा

कौन राम है कौन रहीम
कौन यशु कौन गुरु नानक
कैसे मुझको ये पता चले
जग पूजे क्यों अलग अलग
यहाँ जो बस एक ज्योत जले

एक ही धरती रहने को
रंग लहू का भिन्न नहीं
क्यों बांटा तुमने खुदको
अलग मिला कोई चिन्ह नहीं

जीवन मिला है एक बार
काटेगा वो ही जो बोयेगा
सब है एक सामान यहाँ
जो न माने सब खोयेगा

काहे रे फकीरा खुश

Posted May 26, 2007 by vikasvardhan
Categories: General


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

घर देखे न राह कोई
न कोई साथी साथ तेरे
आंसू एक न आँखों में
न मंजिल कोई राह तके
क्या देख देख मुस्काए तू
किस बात से मन बहलाए तू
काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

दुनिया जहां की ठोकरें तू
किस्मत में लिखवाके आया
छत न कोई सर पे तेरे
दर दर भटके तू बन साया
एक कम्बलिया तन पे लिए
तू जिसके गुणों का गान करे
वो सुने है कब पुकार तेरी
क्यों उस पे झूठा मान करे
खाली झोली उडे हवा के संग
मुस्कान कैसे ये लुटाये तू
काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

इस सात रंग की दुनिया में
मुझे सात पलों की चाह नहीं
मंजिल न कोई अब पाने को
जाना मुझे कोई राह नहीं
जो ख़ुशी तू पाने निकला हैं
वो मृगतृष्णा मैं छोड़ चूका
जिसे देख देख खुश होता तू
वो दर्पण मैं तो तोड़ चूका

लूटेगा कोई क्या मुझ को
मेरे पास तो चंद दुआएं है
आँगन दिल का है खुला हुआ
हर दर्द को यहाँ पनाहें हैं
तू सब पाके दुःख सहता हैं
फ़कीर गरीबी में खुश रहता है

जिस दिन तू ये सच अपनाएगा
उस दिन तुझे समझ ये आएगा
काहे ये फकीरा खुश है
काहे ये फकीरा खुश

सरकार और कल

Posted April 8, 2007 by vikasvardhan
Categories: Issue based

ऑफिस जाते जहाँ न डर हो
एक कल जो आज से बेहतर हो

रेड लाइट जहाँ कोई भूखा न हो
पानी का नल जो सूखा न हो

पढाई जो हर बच्चे तक पहुंचे
कानून के दरवाज़े न हो ऊँचे

नेता जो अपनी जिम्मेदारी समझे
जनता को पैसे से प्यारी समझे

पुलिस की शकल में चोर न घूमे
और गुंडे बनके शेर न घूमे

बेटी घर से निकले तो बाप को न डर हो
नयी सरकार जो लाये ऐसी एक सहर हो

एक वोटर की दुविधा

Posted April 4, 2007 by vikasvardhan
Categories: Issue based


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जो कल कफ़न बांटता था
आज वो नेता बन गया
वो इन्सां तो न बन सका
पर आज नेता बन गया

वोट देने मैं घर से निकला
नेताजी हाथ जोड़े लटके थे
एक कुटिल हंसी होटों पे थी
कुछ कुत्ते पोस्टर पर झपटे थे

अरे हम इससे वफादार है
इसे तो तुम वोट देते हो
और हमें देने को रोटी नहीं
ये उडा देगा रातों की नींदें
और तेरी नींद के खातिर
हम रातों को सोते नहीं

सोचने को मैं मजबूर हूँ
नाजुक सी डोर देश की
मैं किस हाथ को दूँ
कौन इसे अपना मानेगा
इस माटी का गौरव जानेगा

पर हाय रे मेरी समझदारी
मैंने किसे वोट दे डाला
चूहे बिल्ली लगे एक जैसे
चोर लुटेरों से पड़ गया पाला

पर भाई,
तुम ज़रा देख के वोट देना
आगा पीछा सब कुछ जांच लेना
दीया जलाते हाथ न जला लेना
किसी मुर्ख को नेता न बना देना

मैंने रात कब्र में बितायी हैं

Posted March 24, 2007 by vikasvardhan
Categories: Gazals


चिट्ठाजगत

तुम क्या जलाओगे मुझे, मैंने आग खुद को लगायी हैं
मुझे मौत से न डराओ तुम, मैंने रात कब्र में बितायी हैं

फूल खुशबु रंग बांटें, और बांटें हैं इंसान भी
जो बात खुदा न कर सका, वो तुमने कर दिखाई हैं

कह भी दूँ अपना उसे, दिल भी करूँ अपना बयां
पर सूरतों पे सूरतें, क्यों आज उसने लगायी हैं

दिल के सारे दर्द मेरे, आंसू बनके बह गए
मुर्दों की बस्ती के लिए, हंसी लबों पे सजाई है

मुझे न अपनाया कभी, तेरे जहाँ की रिवाजों ने
मैंने दुनिया तेरी छोड़ के, दुनिया नयी बसाई हैं

ये ज़िन्दगी महंगी पड़ी

Posted March 16, 2007 by vikasvardhan
Categories: Gazals


चिट्ठाजगत

फंसी है लाख फंदों में, ये ज़िन्दगी महंगी पड़ी
बुत परस्तो की दुनिया में, बंदगी महंगी पड़ी

एक कली दिल की खिली, और एक दुश्मन बढ़ गया
सायों से डरता हूँ अब, दिल की लगी महंगी पड़ी

अपने बेगाने यहाँ सब, एक रंग में रंग गए
रंगों की ख्वाहिश यहाँ, आँखों को महंगी पड़ी

सब्र भी मैंने किया, सौ दर्द भी मैंने सहे
फिर भी सब न खुश हुए, सादगी महंगी पड़ी

बात दिल की कहने चला, हमराज़ न कोई मिला
अपनों में मैं गैर हूँ, सच्चाई भी महंगी पड़ी

न तुझसे टकराती आँखें, न ऐसे मैं जीया होता
खून ने जो जोश खाया, रवानगी महंगी पड़ी

वो समां सुहाना क्या होगा, जब तू मुझको मिल जायेगा

Posted March 12, 2007 by vikasvardhan
Categories: Uncategorized


चिट्ठाजगत

तेरे इंतज़ार से महकी पल पल, मेरे जीवन की बगिया
वो समां सुहाना क्या होगा, जब तू मुझको मिल जायेगा

तेरे आने की दस्तक पे, कलियों की बाहें खुलने लगी
क्या होगा हाल चमन का मेरे, जब तू सच मुच आ जायेगा
कांटे पे मंडराते भंवरों को, आज तम्मना एक गुल की है
ये होश कहाँ से लायेंगे, जब सारा गुलशन खिल जायेगा

जो राह दिखाए दरिया को, तू पूछ ले मेरा पता उससे
उसे हाल पता मेरे दिल का, मैं कैसे पर्दा करूँ उससे
अब रातों को सोता नहीं, मैं गुलों का रंग चुराता हूँ
जो रंग भरा मैंने ख्वाबों में, वो रंग तुझे भी भायेगा

आजा तू बरखा बनके, मैं माटी सा जलता हूँ
आँखें बिछाये बरसों से, इंतज़ार तेरा मैं करता हूँ
ताबीर तू मेरे ख्वाबों की, दूर न तू रह पायेगा
वो समां सुहाना क्या होगा, जब तू मुझको मिल जायेगा

चेहरा तो सजा के रखा है, स्वाभिमान जला डाला हमने

Posted March 7, 2007 by vikasvardhan
Categories: General


चिट्ठाजगत

कुछ लोग जो देके चले गए, क्या ख़ाक संभाला है हमने
चेहरा तो सजा के रखा है, स्वाभिमान जला डाला हमने

क्या दिया है अपनी माटी को, बस अगणित बार लिया हमने
इस मात ह्रदय के आँचल को, कष्टों से हरा किया हमने
कंचन सी स्वर्णिम काया को, क्यों दाग लगा डाला हमने
चेहरा तो सजा के रखा है, स्वाभिमान जला डाला हमने

चिर निद्रा अब बहुत हुई, रणभेरी सुन उठाना होगा
भय त्याग के आगे बढ़ने का, अब मार्ग हमें चुनना होगा
हर ओर जहाँ खुशहाली हो , उस सुबह को पाना है हमने
चेहरा भी सजा के रखना है, स्वाभिमान भी लाना है हमने