मंजिलों पे तो सिर्फ तन्हाई है
रास्तों पे गुजरने का मज़ा हैं
फूल बनके खिलने से ज्यादा
खुशबु बनके बिखरने का मजा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है
कश्तियाँ साहिल पे नहीं इतराती
वो लहरों की छाती चीरने के सपने देखे
उजाले को कब मिली राहत उजाले में
वो अँधेरे से लड़के मरने के सपने देखे
ना बांधो ख्वाबों को यथार्थ की डोर से
सोच की क्षितिज को धकेलने में मजा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है
सांझ ने हर रोज़ आके गुजर जाना हैं
सहर के इंतज़ार में मज़ा हैं
कब्र तो तैयार है हर एक की
मौत से प्यार करने में मजा हैं
बेमायने तो हर रोज़ मरती हैं ज़िन्दगी
मकसद हो तो एक बार मरने में मज़ा हैं
खोखली ज़िन्दगी के कहाँ है मायने
बिखरने के डर में सवारने का मज़ा है
