मेरे गांव में जब बिजली गुल होती थी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

मेरे गांव में जब बिजली गुल होती थी
मोहक खामोशी छा जाती थी
लालटेन तले तब मेरी माँ
परियों के किस्से सुनाती थी

सब गरमी में हैरान परेशान
हाथों से पंखे चलाते थे
श्वेत श्याम न कोई दिखे
सब एक वर्ण हो जाते थे

तुझ पे कितना निर्भर जीवन
तेरे बिन आलम तपता था
जिस मुख ने कभी न राम कहा
तेरे नाम की माला जपता था

दुःख सुख की बातें करते थे
सब अपने किस्से सुनाते थे
ऐ बिजली तेरे जाने से
दिल और करीब आ जाते थे

तारों की गिनती करने में
जब रात गुज़रने लगती थी
माँ की थपकी से आंखों में
तब नींद उतरने लगती थी

सौ तोहफों जितनी खुशी थी वो
जो बिन मांगे मिल जाती थी
मुझे बेहद भाती थी वो रातें
जब मेरे गांव में बिजली गुल होती थी

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