वो भूल चला हर रिश्ता


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

इन माटी के रिश्तों को, वो माटी में ही भूल चला
यूं लाज वतन की रखने को, वो तन से बन धूल चला

गुलशन को सहेजे रखने को, किसी गुल को मिटना पड़ता है
आजादी मुफ़्त नहीं मिलती, सूली पर चदना पड़ता हैं
जो कीमत तुमने देनी थी, वो दे सूली पर झूल चला
बलिदानों की राहों में वो, रखकर प्राणों का फूल चला

वो रौनक था जिस आँगन की, वो आँगन कुछ खामोश सा है
एक बूँद नहीं है आंसू की, पर शायद कुछ अफ़सोस सा है
चुप सी वो माँ अब गर्वित हैं, जिसका बेटा उसे भूल चला
एक माँ के दर्द मिटाने को, एक माँ का दामन छोड़ चला

यह जीवन म्रत्यु के लम्हे, कभी उसे न छूने पाएंगे
वो अमर रहेगा मर के भी, मरने वाले मर जायेंगे
देकर तुमको एक नवजीवन, वो जीवन से दूर चला
यूं लाज वतन की रखने को, वो तन से बन धूल चला

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