सुनो दरवाज़े पे तनहाई आई है


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सुनो दरवाज़े पे तनहाई आई है
अभी न मिलना उससे
वरना मुझे भूल जाओगे तुम
दो कदम उसके संग जाके
न जाने कब लौट पाओगे तुम

मैंने भी तो तुम्हे चाहा है
हर दिल के कोने से
राह तुम्हारी ही देखी है
शाम के सुर्ख होने तक
अब आंखों में जो आए हो तो
न दिल से लो अभी रुकसत
दो बातें हम से भी करलो
चैन हमको भी आ जाए

होगी पसंद तुम्हे तनहाई
मुझको पसंद नहीं
तुम्हारे वास्ते हर रोज़ मिलती हूँ मगर उससे
कभी मेरी आंखों में खुदको खोके देख मेरे हमदम
तुझे तनहाई मिल जायेगी और मुझको मेरी खुदाई

Published in: on September 7, 2007 at 11:48 p

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