रखके धीर बढ़ चल तू


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सुनके मुश्किलों की दस्तक
कदम पीछे न धरना
कोई भी राह तू थामे
मुमकिन नहीं है इनसे बचना
ये मंजिलों की प्रहरी हैं
हर रास्ते पे ठहरी है
इनका आहट इशारा है
मंज़िल करीब होने का
रखके धीर बढ़ चल तू
वक्त नहीं ये मायूस होने का

तुझे मिल जाए जो खुशियाँ
किसी गली कुचे पे गर यूं ही
बिखर जाए जो कलियाँ
तेरे पथ पे गर यूं ही
खुशबु पसीने में तुझे
महसूस न होगी
शमा जल भी गई गर
दिल में रोशनी न होगी
मिलके भी जो खुशी न मिल सके तुझे
क्या फायदा ताउम्र ऐसा बोझ दोने का

जब तूने लड़ने की ठानी
जीत ही तेरी भाषा है
बीच जो कुछ भी हो गया
उसने तुझको तराशा है
कुंदन बन के है चमका
जला जो टुकडा सोने का

Published in: on September 8, 2007 at 11:48 p

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