चल साथ मेरे उस सूरज को, ये राह उधर को जाती हैं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कल खामोशी का आलम था, बीती बातें याद आती थी
जो लौट सके न मुड़ कर के, उस वक्त की यादें लाती थी
अब फिर जागा है मुझमें जूनून, अम्बर से बातें होती है
चल साथ मेरे उस सूरज को, ये राह उधर को जाती हैं

खोने पाने का खेल है यह, कुछ हार नहीं कुछ जीत नहीं
पाकर भी मिलता नहीं सब कुछ, खोकर भी सब कुछ खोता नहीं
जीं भर जो जियें इस जीवन को, हर घड़ी याद बन जाती हैं
चल साथ मेरे उस सूरज को, ये राह उधर को जाती हैं

राहों पे मंज़िल की बातें, मंज़िल पे राहों के चर्चे
कोई कैसे जाने क्या सच हैं, कैसे समझे क्या मिला उसे
यह लम्हा लो वो लम्हा हुआ, खोने को अब क्या बाकी हैं
चल साथ मेरे उस सूरज को, ये राह उधर को जाती हैं

तन्हाई का एहसास कभी जो तेरी आंखों पे छाये
पलको को झुका के कह लेना जो बात तेरे दिल में आए
हर पल मैं हूँ साथ तेरे हम जीवन भर के साथी हैं
चल साथ मेरे उस सूरज को, ये राह उधर को जाती हैं

Published in: on September 25, 2007 at 11:48 p

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