हम उनसे और वो हमसे रात दिन मिलते रहे


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हम उनसे और वो हमसे रात दिन मिलते रहे
जाने फिर क्यों दूर दूर हम उम्र भर चलते रहे

लम्हों की रेत पे गिरा, जो आंसू मेरी आँख का
कुछ लम्हे कांटे बन चुभे, कुछ फूल बन खिलते रहे

हमसे बेबस इस जहाँ में कौन है बतलाइये
बुत समझ जिसे पूजा किये, चेहरा वो बदलते रहे

पलकों की कलम से आंखों में, तस्वीर तेरी बन गई
उसपे धूल बनके जम गए,  तेरे ख्वाब जो पलते रहे

दुनिया की रिवाजों ने कब दिया किसको सुकून
इधर हम जलते रहे, उधर तुम जलते रहे

कौन जाने मेरा खुदा मिल जाये कब किसी मोड़ पे
हाथ थामे आस का, तूफानों से हम लड़ते रहे

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