शायद ये तेरा सितम आख़िरी हैं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हर जख्म भरके महकने लगा है
मेरे हिस्से का ये गम आख़िरी है
तेरा दिल भी अब पिंघलने लगा है
शायद ये तेरा सितम आख़िरी हैं

आगे बिछे है गुल हर पथ पे
कांटों भरी ये डगर आख़िरी है
उम्मीद का हर दिया जल उठा हैं
तम का ये बेबस पहर आख़िरी हैं

हर एक पल यों रंगा आज मैंने
जीवन का ज्यों ये पल आख़िरी है
न टूटेगा अब ये कभी आँधियों में
ये बगिया का मेरी कमल आख़िरी हैं

अदा से ही चाहे झलक तो दिखाजा
तेरी गलियों से मेरा सफर आखिरी हैं
अब दूर जाने को मैं चल पड़ा हूँ
तेरे शहर में ये मेरी सहर आखिरी हैं

Published in: on October 6, 2007 at 11:48 p

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