ज़ुल्म आदत बनाके सहने लगा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण
हर कोना घर का जलने लगा
अहिंसा की झीनी चादर में
वो अपने डर को ढकने लगा
खुदा से करके वादे झूठे
दे ख़ुद को तसल्ली झूठी
एक और बेटा देश का
ज़ुल्म आदत बनाके सहने लगा

गाँधी के विचारों को पढ़ा समझा
मतलब अपने हिसाब से निकला
अहिंसा के असल मायने को
जरूरतों ने बदल डाला
लहू जो बहता था जूनून बनके
वो बनके पानी बहने लगा
एक और बेटा देश का
ज़ुल्म आदत बनाके सहने लगा

कैसे लिखोगे मेरे देश का कल
इन कमजोर हाथो से
कब तक बेह्लाओगे ख़ुद को
इन सब झूठी बातों से
ख़ुद के डर को तो जीतो
देश भी जीत जाएगा
इस वीरों की भूमि पे
फिर कौन आँख उठाएगा
जला जो दीप अंधेरों में
वो  रोशिनी बनके बहने लगा
धन्य हो गई वो धरा
जहाँ हर बेटा ज़ुल्म से लड़ने लगा

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