मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

आज दबा पन्नों में कहीं, कल जीवन यहाँ जो होता था
जहाँ चाँद को देखे बिन न कभी सूरज पानी में सोता था
हाथो से तेरे गुलशन उजड़ा तू पाके स्वार्थ बस हर्षाया
मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया

बेहतर जीवन की चाहत में सुंदर जीवन तो जिया नहीं
सागर समीप तू प्यासा हैं, सरिता का जल क्यों पिया नहीं
तेरी इस मृगतृष्णा ने तुझे आज यह दिन दिखलाया
मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया

पेडों से न सीखा तुने हर पल जीवन रस बरसाना
पत्ते शाखें और फूल छांव, औरों के लिए बस मिट जाना
हक़ मान के बस लेता ही रहा, तू निर्लज्ज न शरमाया
मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया

अपने सपनो की यह दुनिया क्यों आज नहीं भाती तुझको
क्यों चैन नहीं है दिन में तुझे, क्यों नींद नहीं आती तुझको
कागज़ के फूल खिला तो दिए, खुशबु तू पीछे छोड़ आया
मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया

क्यों मौत की शक्ल बनता हैं जीवन के कोरे पन्नों पे
क्या नाम पूछे बरसेंगे यह शोले तेरे अपनों पे
सुख की राहें भी आसन थी, क्यों दुःख के पथ को अपनाया
मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया

Published in: on October 24, 2007 at 11:48 p

The URI to TrackBack this entry is: http://vikasvardhan.wordpress.com/2007/10/24/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%82/trackback/

RSS feed for comments on this post.

One Comment Leave a comment.

  1. On October 26, 2007 at 11:48 p hemjyotsana parashar Said:

    पेडों से न सीखा तुने हर पल जीवन रस बरसाना
    पत्ते शाखें और फूल छांव, औरों के लिए बस मिट जाना
    हक़ मान के बस लेता ही रहा, तू निर्लज्ज न शरमाया
    मैं अपनी प्यारी धरती पे इंसान बनाके पछताया….. बहुत सुन्दर..

    कोई शब्द नही. जो. बया कर सके…

    अपने सपनो की यह दुनिया क्यों आज नहीं भाती तुझको
    क्यों चैन नहीं है दिन में तुझे, क्यों नींद नहीं आती तुझको

    बहुत सुन्दर रचना है…
    बधाई

    सादर
    हेम

Leave a Comment

You must be logged in to post a comment.