वो मुस्कुराके के रो पड़ा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अंधेरो में बीती उम्र उसकी, उजाले देख कर वो रो पड़ा
तेरे आने की जो ख़बर सुनी , वो मुस्कुराके के रो पड़ा

कोई बात होठों पे आते आते दिल में रह गई
भूलके अपनी खतायें, हर दर्द भुला वो रो पड़ा

उम्मीद की हर डोर अब एक फंदा बन गई
उड़ने की चाहत लिए आसमां देख कर वो रो पड़ा

क्या सही था क्या ग़लत ये कशमकश रही उम्र भर
मुट्ठी से फिसले लम्हों के देखे निशान तो वो रो पड़ा

उम्र भर संजोई दौलत को वक्त की दीमक लग गई
बांटने की जो चीज़ थी घर में छुपा वो रो पड़ा

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