डूब गया फिर एक सूरज, एक नई सुबह संग लाने को


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जीवन तो कबसे अर्पण था, लुटा चला वो प्राणों को
डूब गया फिर एक सूरज,  नई सुबह संग लाने को

आंखों में तेज दिल में सुकून, चेहरे की आभा न्यारी थी
देश पे अब बन आई थी, अब मर मिटने की बारी थी
हंसते हंसते वो कूद पड़ा, साँसों की भेट चढाने को
डूब गया फिर एक सूरज,  नई सुबह संग लाने को

उसके लहू की खुशबु से, कल सारा आँगन महकेगा
तेरी आंखों से शायद वो, इस खुले गगन को देखेगा
चाहे से कहाँ यूं मिलता है, माटी का कर्ज़ चुकाने को
डूब गया फिर एक सूरज,  नई सुबह संग लाने को

पल दो पल जो रात मिले, उसे आंसू में मत धोना
दर्द निशां बन रुक जाए, तुम इस कदर भी न रोना
बिखरा तेरे आँगन का गुल, सारा गुलशन महकाने को
डूब गया फिर एक सूरज,  नई सुबह संग लाने को

एक रिश्ते की लाज बचाने को, वो सौ रिश्तों को तोड़ चला
हिम जैसा सीना अडिग रहा , हर तूफ़ान का रुख मोड़ चला
रण भूमि गा के सुनाएगी युग – युग में उन बलिदानों को
डूब गया फिर एक सूरज,  नई सुबह संग लाने को

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