तुम्हें सामने पाया तो हम, हम न रह गए


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

तुम्हें सामने पाया तो हम, हम न रह गए 
कुछ और कहना चाहा कुछ और कह गए

कौन जाने किसे देख कर कब होश उड़ जाए
तूफानों में जो डटे रहे, छीटों में बह गए

खोके होश फिर गिर पड़ा लो चाँद अम्बर से
सूरज कई तेरी जुल्फों की छावों में ढल गए

रब जैसे तेरा रूप,  और उसपे सादगी का जामा
तारीफ़ हमसे हो न सकी,  इबादत में लग गए

सब्र की इम्तेहां क्या है यह हमसे न पूछो
रिश्ता तुझसे जोडके, हम सबकुछ सह गए

पूछा इस जहान ने जब मैं किसमे हूँ फना
नाम तेरा लेना चाहा और ग़ज़ल सी कह गए

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