क्या बयां करूँ मैं लब्जों में, दुनिया में कैसे जीते हैं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एक रोज़ जो तुमने पूछ लिया, दुनिया में कैसे जीते हैं
क्या बयां करूँ मैं लब्जों में, दुनिया में कैसे जीते हैं

जो सत्य को चरखे पे रखके, चादर आज़ादी की बना गए
श्रम, त्याग, तपस्या सर्वस हैं अपने जीवन से सिखा गए
देखो बापू के जीवन को, दुनिया में ऐसे जीते हैं

कर्तव्य विमुख न होना कभी, यह बात तुझे समझानी हैं
हर पल तू बढे प्रगति पथ पे, अज्ञान की लंका ढानी हैं
सीखो मर्यादा पुरुषोत्तम से, दुनिया में ऐसे जीते हैं

शायद वो लोग दीवाने थे, इस भूमि को माता माने थे
माटी की आन बचाने को, वो अपना सीना ताने थे
जीने से बढ़कर हो कोई जूनून, दुनिया में ऐसे जीते हैं

ये साथी सरगम नित मेले, संग तेरे कुछ दूर चले
कहीं आँखें नम मत कर लेना, जब तुझको ये भूल चले
चलना सबको तनहा ही पड़ा, झूठी दुनिया की प्रीतें हैं
क्या बयां करूँ मैं लब्जों में, दुनिया में कैसे जीते हैं

Published in: on March 1, 2007 at 11:48 p

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