ये एक ख्वाब लेके मैं घर से चला था, मुझे न पता था मैं घर में भला था


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी ढलते सूरज को जी भर के देखूं, कभी चांदनी के आँचल में लेटूं
कभी ओढ झिलमिल सितारों की चादर, सपने चुरा अपनी आंखों में भर लूँ
ये एक ख्वाब लेके मैं घर से चला था, मुझे न पता था मैं घर में भला था

कहाँ चैन मिलता है दौलत के दर पे, कब नीदें बिकती है सिक्कों के बदले
जख्मी दिलों पे झूटी हँसी क्यों, क्यों खुशबु उडी लाख फूलों को कुचले
तनहाइयों से बचने ये महफिल सजी हैं, यूं महफिल में तनहा दिखते हैं सारे
ज्यों अम्बर के आँचल पे साथ खिले है,  मगर तनहा तनहा ही रहते है तारे

इन गलियों में खुशियों के मेले सजे है, मुझे दूर से ऐसा लगा था
ये एक ख्वाब लेके मैं घर से चला था, मुझे न पता था मैं घर में भला था

उजाले चुरा के किसी की नज़र के,  दीये जैसा रोशन वो जलना चाहे
दुनिया में सबको छोटा बताकर, वो जीवन से बड़ा बनना चाहे
सौगात में दे अपनों को कांटे,  गैरों के घावों को सी रहा हैं
मुर्दों की बस्ती में दौलत की बारिश,  इंसान कोई न बाकी बचा हैं

नया कोई रास्ता यहीं से मिलेगा, मेरी आंखों को यह धोखा हुआ था
ये एक ख्वाब लेके मैं घर से चला था, मुझे न पता था मैं घर में भला था

मैं की सीमा हो गई आज छोटी,  मैं से मैं को टकराते देखो
खुदा कैद करके कहीं पत्थरों में,  माटी के पुतलो को इतराते देखो
सदियों के सागर में पल भर की सरिता,  कहीं निशान भी न बाकी बचेगा
जीवन पे रंग रुकते नहीं हैं, ये मौसम के जैसे बदलता रहेगा

ये सच मुझे कल भी पता था, मैं फिर क्या ढूंढने चला था
झूठा ख्वाब लेके मैं घर से चला था,  लगता है जैसे मैं घर में भला था

Published in: on March 2, 2007 at 11:48 p

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