तेरी बात उठी जब महफिल में

तेरी बात उठी जब महफिल में
हम कहते गए सब सुनते गए
यूं दौर चला पैमानों का
वो देते गए हम पीते गए
किस डगर पे हमको जाना था
किस राह मगर हम चल निकले
आंखों ने तेरी था जाल बुना
तुम कसते गए हम चलते गए
न चाँद गगन पे आने दिया
न तुम आंखों के नूर हुए
इंतज़ार में तेरे हम ऐ कातिल
कुछ जीते गए कुछ मरते गए
जो बातें तुझसे कहनी थी
वो बातें मह से कह डाली
आंखों के दीये तेरी राहों में
कुछ जलते गए कुछ बुझते गए
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