मिल जाए कहीं बांसुरी वाला


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पनघट को चली लो बृज बाला, नैनो में समाये नन्द लाला
पग पग बस वो ये चाहे, मिल जाए कहीं बांसुरी वाला

ये राह गई वो मोड़ गया, क्या कान्हा हमको छोड़ गया
न टूटी आज कोई मटकी, पर सबके दिल क्या तोड़ गया

अब हम किस पर रूठेंगे, अब हम किसे मनायेंगे
किस संग खेलेंगे होली, माखन किस से छुपायेंगे

पनघट जाते कदमो ने, नंद भवन की राह पकड़ी
ज्यों कृष्ण समाये बाहों में, यूं मटकी हाथों में जकड़ी

नन्द द्वारे पहुँच के उसने, पूछी कान्हा की कुशलाई
घर में मची थी उथल पुथल, माँ यशोदा थी गुस्साई

माखन बिखरा था यहाँ तहां, मटकी छीका सब टूटे थे
रस्सी से बंधे थे नंदलाला, आंखों में आंसू झूठे थे

जिनका न कोई ओर छोर, उन्हें बांधे बस प्रेम डोर
सब जल थल को नाच नचावे यशोदा तेरो माखन चोर

धन्य भई ये ब्रज भूमि, धन्य भये सब नर नारी
पायो केशव को साथ यहाँ, यो कोई पुण्य भयो भारी

Published in: on April 4, 2007 at 11:48 p

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