वो ग़ज़ल है

जो बात होठों पे ठहर जाए वो ग़ज़ल है
जो याद दर्दों में हंसाये वो गज़ल है
क्यों लिखूं मैं शब्दों को जोड़ तोड़ के
जो बात दिल लिखवाना चाहे वो ग़ज़ल है
दिल पे मौसम भी अगर बस चार आते
ज़िंदगी में फिर कहाँ इतने रंग समाते
खुशियाँ तो संग लायी थी दोस्त लाखों
गम में बचा जो एक यार वो ग़ज़ल है
गुलों की महफिल में सजे है साज काँटों के
लब पे आ ही जायेंगे यहाँ सब राज़ आंखों के
मेरे दिल की हालत को लो लब्जों में कहता हूँ
जो चाह कर न बोल पाऊं वो ग़ज़ल है
वो चले है बाँधने मुझे बस चंद पन्नों में
मन की उड़ानो पे भी क्या पहरा लगायेंगे
नाप तोल की दुनिया के संग मैं रहूँ कैसे
पैमानों में मैं बंधती नहीं हूँ मैं ग़ज़ल हूँ
The URI to TrackBack this entry is: http://vikasvardhan.wordpress.com/2008/04/30/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a4%b2-%e0%a4%b9%e0%a5%88/trackback/
One Comment Leave a comment.
Leave a Comment
You must be logged in to post a comment.
खुशियाँ तो संग लायी थी दोस्त लाखों
गम में बचा जो एक यार वो ग़ज़ल है
bahut badhiya