मेरा शहर क्यों सोता नहीं

क्यों भागता है रात दिन, मेरा शहर क्यों सोता नहीं
क्यों दर्द समेटे है लाखों, मेरा शहर क्यों रोता नहीं
सबकी राहें मिलती है, इस मोड़ पे जहाँ मैं रुका
मगर किसी मंजिल पे क्यों ये रास्ता जाता नहीं
यूं तो मिलती खोती है यहाँ रोज़ लाखों नेमते
चैन है जो मिलता नहीं दर्द है जो जाता नहीं
आसमान को छू रही है इन महलों की बुलंदियां
प्यार को मिले जगह वो घर कोई बनवाता नहीं
खुशियों के बहाने ढूँढता तू यहाँ पर रात दिन
खुशबू की चाहत उसे, गुल देख जो मुस्काता नहीं
ये हाथ देखो कहीं कुदरत का न दामन नोच ले
गुलशन तबाह करके कभी आँगन कोई सजता नहीं
May 15, 2007 at 11:48 p
ये हाथ देखो कहीं कुदरत का न दामन नोच ले
गुलशन तबाह करके कभी आँगन कोई सजता नहीं
bahut sunder