काहे रे फकीरा खुश


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

घर देखे न राह कोई
न कोई साथी साथ तेरे
आंसू एक न आँखों में
न मंजिल कोई राह तके
क्या देख देख मुस्काए तू
किस बात से मन बहलाए तू
काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

दुनिया जहां की ठोकरें तू
किस्मत में लिखवाके आया
छत न कोई सर पे तेरे
दर दर भटके तू बन साया
एक कम्बलिया तन पे लिए
तू जिसके गुणों का गान करे
वो सुने है कब पुकार तेरी
क्यों उस पे झूठा मान करे
खाली झोली उडे हवा के संग
मुस्कान कैसे ये लुटाये तू
काहे रे फकीरा खुश तू
काहे रे फकीरा खुश

इस सात रंग की दुनिया में
मुझे सात पलों की चाह नहीं
मंजिल न कोई अब पाने को
जाना मुझे कोई राह नहीं
जो ख़ुशी तू पाने निकला हैं
वो मृगतृष्णा मैं छोड़ चूका
जिसे देख देख खुश होता तू
वो दर्पण मैं तो तोड़ चूका

लूटेगा कोई क्या मुझ को
मेरे पास तो चंद दुआएं है
आँगन दिल का है खुला हुआ
हर दर्द को यहाँ पनाहें हैं
तू सब पाके दुःख सहता हैं
फ़कीर गरीबी में खुश रहता है

जिस दिन तू ये सच अपनाएगा
उस दिन तुझे समझ ये आएगा
काहे ये फकीरा खुश है
काहे ये फकीरा खुश

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