सुबह की बात

चाँद छुपा के झोली में, सूरज से पर्दा हटाया
आँखों आधी खुली है आधी बंद
किसी हवा के झोंके ने, बालों को सहलाया
कुछ सपने जो कल टूटे थे, लो आज फिर बन गए
किसने जोड़ के टुकड़े हर ख्वाब फिर सजाया
कल जो गुस्सा था आज कम है
रात की मलहम ने हर घाव को सहलाया
कन्धों पे लिए बसते निकले गली के बच्चे
बचपन पे लगी धुल को पल भर के लिए हटाया
आज रंग अलग है फिजा अलग है
गुलों की वादियों को नए फूलों ने महकाया
परिंदों को जाते देखा तो हमें भी एहसास हुआ
बिस्तर छोड़ने का अपना भी वक़्त आया
आज चलो कुछ नयी कहानी लिखेंगे
शायद आज ज़िन्दगी बेहतर होगी
ये ख्वाब दिखा फिर सुबह ने दिन भर दौड़ाया