माँ

मेरे घर लौटने पे चिड़ियों सी चेह्कती है माँ
मेरे हर आंसू पे आज भी दहकती है माँ
मेरा बचपन संजोये आँखों में
मेरी साँसों में मेरी बातों में महकती है माँ
लाख बुरा बनाये मुझे ये दुनिया
गंगा सा पावन मुझे करती है माँ
जो मिले मुझे सुकून की ज़िन्दगी
लाख काँटों से रोज़ गुजरती हैं माँ
सुला के आज भी अपनी गोद में
मुझे प्यार से देखा करती है माँ
रब की मेहर तो होती कभी कभी
शामोसेहेर मेहर करती है माँ
बांधे टूटे हौंसले, उम्मीदों की डोर से
मेरे मकान को घर बनाती है माँ
फ़िक्र नहीं मुझे गगन तेरी छाँव की
जब तलक आँचल तले सुलाती हैं माँ
माँ के सिवा क्या नाम दूं ऐ खुदा तुझे
कभी नींद से जगाती है
कभी लगा छाती से सुलाती है माँ